भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा सहयोग का नया अध्याय: समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग और इंडो-पैसिफिक रणनीति की ओर बढ़ते कदम
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित दूसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा मंत्रियों के संवाद (Defence Ministers' Dialogue) के दौरान समुद्री सुरक्षा, समुद्री निगरानी (Maritime Domain Awareness), रक्षा उद्योग सहयोग और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। भारतीय रक्षा मंत्री Rajnath Singh और ऑस्ट्रेलिया के उप प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री Richard Marles ने इस बैठक की सह-अध्यक्षता की।
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने क्या-क्या फैसले लिए?
बैठक के दौरान दोनों देशों ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्णय लिए:
1. समुद्री निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने पर सहमति
दोनों देशों ने समुद्री गश्ती विमानों (Maritime Patrol Aircraft) के माध्यम से संयुक्त समुद्री निगरानी गतिविधियों को आगे बढ़ाने और समुद्र के नीचे होने वाली गतिविधियों (Undersea Domain Awareness) पर निगरानी बढ़ाने पर सहमति जताई। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में अवैध गतिविधियों, तस्करी, समुद्री डकैती और सैन्य गतिविधियों की बेहतर निगरानी करना है।
2. संयुक्त समुद्री सुरक्षा रोडमैप
भारत और ऑस्ट्रेलिया संयुक्त समुद्री सुरक्षा सहयोग रोडमैप (Joint Maritime Security Collaboration Roadmap) को अंतिम रूप देने की दिशा में काम कर रहे हैं। इससे दोनों देशों की नौसेनाओं और तटरक्षक बलों के बीच समन्वय बढ़ेगा।
3. रक्षा उद्योग सहयोग
दोनों देशों ने रक्षा उपकरणों और सेवाओं के आदान-प्रदान के लिए एक नए समझौता ज्ञापन (MoU) पर काम शुरू करने का निर्णय लिया है। इससे रक्षा उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा।
4. सैन्य अभ्यास और लॉजिस्टिक सहयोग
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 2020 के Mutual Logistics Support Arrangement (MLSA) को और प्रभावी बनाने तथा एक-दूसरे के सैन्य अड्डों और सुविधाओं के उपयोग को बढ़ाने पर सहमति जताई।
भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों का इतिहास
2014: नई रणनीतिक शुरुआत
भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में बड़ा मोड़ तब आया जब Narendra Modi ने 2014 में ऑस्ट्रेलिया की यात्रा की। इसके बाद दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा।
2020: व्यापक रणनीतिक साझेदारी (CSP)
2020 में दोनों देशों ने Comprehensive Strategic Partnership (CSP) स्थापित की। इसके तहत रक्षा, व्यापार, साइबर सुरक्षा, खनिज, शिक्षा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया गया।
भारत-ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख रक्षा समझौते
1. Mutual Logistics Support Arrangement (MLSA) – 2020
इस समझौते के तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, ईंधन, मरम्मत और रसद सुविधाओं का उपयोग कर सकती हैं।
2. Air-to-Air Refuelling Arrangement – 2024
इस व्यवस्था से दोनों देशों की वायु सेनाएं संयुक्त अभियानों में एक-दूसरे के विमानों को हवा में ईंधन उपलब्ध करा सकती हैं।
3. Submarine Rescue Agreement – 2025
पनडुब्बी दुर्घटना या आपदा की स्थिति में दोनों देश एक-दूसरे की सहायता करेंगे।
4. Joint Staff Talks – 2025
संयुक्त सैन्य योजनाओं, अभ्यासों और परिचालन समन्वय के लिए एक स्थायी तंत्र स्थापित किया गया।
5. Maritime Security Collaboration Roadmap
हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और निगरानी को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति।
प्रमुख संयुक्त सैन्य अभ्यास
AUSINDEX
भारत और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं के बीच होने वाला प्रमुख समुद्री युद्धाभ्यास।
AUSTRAHIND
दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास।
MALABAR
भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका का प्रमुख नौसैनिक अभ्यास।
KAKADU और MILAN
बहुपक्षीय समुद्री अभ्यास जिनमें दोनों देश भाग लेते हैं।
इस साझेदारी के फायदे (Merits)
1. हिंद महासागर में सुरक्षा मजबूत होगी
समुद्री निगरानी बढ़ने से चीन की बढ़ती गतिविधियों, समुद्री डकैती और अवैध मछली पकड़ने जैसी चुनौतियों पर नजर रखी जा सकेगी।
2. भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी
ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ सहयोग से भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भूमिका मजबूत होगी।
3. रक्षा उद्योग को लाभ
भारतीय रक्षा उद्योग को ऑस्ट्रेलियाई निवेश, तकनीक और बाजार तक पहुंच मिल सकती है।
4. नौसेना और वायुसेना की क्षमता बढ़ेगी
संयुक्त अभ्यासों से सैन्य दक्षता और परिचालन क्षमता में सुधार होगा।
5. आपदा प्रबंधन और खोज-बचाव में सहयोग
हिंद महासागर क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं और समुद्री दुर्घटनाओं के दौरान बेहतर सहयोग संभव होगा।
संभावित चुनौतियां और नुकसान (Demerits)
1. चीन के साथ तनाव बढ़ सकता है
भारत-ऑस्ट्रेलिया की बढ़ती रक्षा साझेदारी को चीन अपने खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देख सकता है।
2. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर बहस
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि पश्चिमी देशों के साथ अत्यधिक सैन्य निकटता भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर प्रश्न खड़े कर सकती है।
3. रक्षा परियोजनाओं में लागत
संयुक्त सैन्य कार्यक्रमों और तकनीकी सहयोग में बड़ी वित्तीय लागत आ सकती है।
4. तकनीकी निर्भरता का जोखिम
यदि रक्षा तकनीक का पर्याप्त हस्तांतरण नहीं हुआ तो भारत विदेशी तकनीक पर निर्भर रह सकता है।
चीन और इंडो-पैसिफिक संदर्भ
भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों "मुक्त, खुला और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक" (Free and Open Indo-Pacific) का समर्थन करते हैं। दोनों देशों ने समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, अंतरराष्ट्रीय कानून और विशेष रूप से 1982 के UNCLOS का समर्थन दोहराया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह सहयोग आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा संबंध अब केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं रह गए हैं। समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, तकनीकी अनुसंधान, लॉजिस्टिक्स, पनडुब्बी बचाव, सूचना साझाकरण और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। यह साझेदारी हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति को भी सशक्त बना सकती है। हालांकि, चीन के साथ संभावित तनाव, आर्थिक लागत और रणनीतिक संतुलन जैसी चुनौतियों को भी ध्यान में रखना होगा। भारत के लिए यह साझेदारी अवसर और सावधानी—दोनों का विषय है।