अमित शाह के ‘वनवासी’ बयान पर क्यों भड़का आदिवासी समाज? पूरा विवाद समझें

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अमित शाह के ‘वनवासी’ बयान पर क्यों भड़का आदिवासी समाज? जानिए पूरा विवाद, इतिहास और राजनीति

दिल्ली में आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक महोत्सव और “जनजातीय महाकुंभ” के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah द्वारा आदिवासी समाज को “वनवासी” कहे जाने के बाद देशभर, खासकर झारखंड में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। रांची में कई आदिवासी संगठनों ने विरोध मार्च निकाला, पुतला दहन किया और कहा कि “आदिवासी” शब्द उनकी पहचान, इतिहास और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है, जबकि “वनवासी” शब्द उनकी मूल पहचान को कमजोर करने की कोशिश है।

यह विवाद केवल एक शब्द का नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति, धर्म, संविधान और राजनीति से जुड़ा गहरा मुद्दा बन चुका है।

क्या कहा अमित शाह ने?

जनजातीय महाकुंभ में बोले गृह मंत्री अमित शाह। (X- @BJP4India)

दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित “जनजातीय महाकुंभ” में अमित शाह ने कहा कि:

“वनवासी समाज प्रकृति की पूजा करता है और यही परंपरा उसे सनातन संस्कृति से जोड़ती है।”

उन्होंने यह भी कहा कि:

  • यूसीसी (Uniform Civil Code) से आदिवासी समाज को डरने की जरूरत नहीं।
  • भाजपा शासित राज्यों में जनजातीय समुदायों को विशेष प्रावधान देकर यूसीसी से बाहर रखा गया है।
  • जबर्दस्ती धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया जाएगा।
  • भगवान राम और शबरी-निषादराज के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने आदिवासी समाज को सनातन परंपरा का हिस्सा बताया।
  • बिरसा मुंडा के “उलगुलान” के बाद इसे सबसे बड़ा जनजातीय आंदोलन बताया।

आदिवासी संगठनों ने क्यों किया विरोध?

आदिवासी संगठनों ने क्यों किया विरोध?

रांची में जयपाल सिंह स्टेडियम से अलबर्ट एक्का चौक तक विरोध मार्च निकाला गया। आदिवासी जनपरिषद, केंद्रीय सरना समिति और अन्य संगठनों ने आरोप लगाया कि “वनवासी” शब्द आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान मिटाने की कोशिश है।

“हमें आदिवासी ही रहने दें, हमारी संस्कृति और धर्म को खत्म कर ‘वनवासी’ न कहा जाए।”

आदिवासी नेताओं का कहना है कि “आदिवासी” शब्द का अर्थ है इस भूमि के मूल निवासी। यह केवल एक शब्द नहीं बल्कि उनके संघर्ष, इतिहास और संवैधानिक अधिकारों का प्रतीक है।

‘आदिवासी’ और ‘वनवासी’ शब्द में क्या अंतर है?

शब्द अर्थ समर्थन करने वाले
आदिवासी मूल निवासी आदिवासी संगठन, सरना समूह, सामाजिक कार्यकर्ता
वनवासी जंगल में रहने वाला RSS और उससे जुड़े कुछ संगठन

आदिवासी संगठनों का कहना है कि “आदिवासी” शब्द उन्हें जल-जंगल-जमीन और ऐतिहासिक अधिकारों से जोड़ता है, जबकि “वनवासी” शब्द उनकी राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करता है।

सरना धर्म और प्रकृति पूजा का मुद्दा

झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य भारत के कई आदिवासी समुदाय स्वयं को प्रकृति पूजक मानते हैं। वे सिंगबोंगा, धर्मेश, जल, जंगल, पहाड़, धरती और पेड़-पौधों की पूजा करते हैं।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि उनकी धार्मिक पहचान हिंदू, मुस्लिम या ईसाई ढांचे से अलग है। इसलिए उन्हें “सनातन संस्कृति” का हिस्सा बताने पर भी कई समूहों ने आपत्ति जताई।

यूसीसी पर अमित शाह का बयान

“यूसीसी का कोई भी प्रावधान वनवासी समाज पर लागू नहीं होगा।”

अमित शाह ने कहा कि भाजपा शासित राज्यों में जनजातीय समुदायों को यूसीसी से बाहर रखा गया है। उन्होंने लोगों से कहा कि वे समाज में फैलाए जा रहे भ्रम से डरें नहीं।

हालांकि कुछ आदिवासी संगठनों का मानना है कि यूसीसी लागू होने से पारंपरिक रीति-रिवाज, विवाह, उत्तराधिकार और सामुदायिक कानून प्रभावित हो सकते हैं।

धर्मांतरण और डिलिस्टिंग विवाद

इस विवाद के बीच “डिलिस्टिंग” की मांग भी तेज हुई। कुछ संगठनों का कहना है कि जो आदिवासी ईसाई धर्म अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) सूची से बाहर किया जाए।

इसके समर्थकों का कहना है कि धर्मांतरण के बाद विशेष आरक्षण और जनजातीय सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए, जबकि विरोध करने वाले इसे आदिवासी समाज को बांटने की राजनीति बता रहे हैं।

बिरसा मुंडा की विरासत और राजनीति

अमित शाह ने अपने भाषण में कई बार भगवान बिरसा मुंडा का उल्लेख किया और कहा कि यह “उलगुलान” के बाद सबसे बड़ा जनजातीय आंदोलन है।

  • बिरसा मुंडा 19वीं सदी के महान आदिवासी क्रांतिकारी थे।
  • उन्होंने ब्रिटिश शासन और जमींदारी शोषण के खिलाफ संघर्ष किया।
  • वे जल-जंगल-जमीन की रक्षा के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं।
  • झारखंड आंदोलन और आदिवासी अस्मिता के सबसे बड़े नायक हैं।

भाजपा और आदिवासी राजनीति

भाजपा लंबे समय से आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि:

  • अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पहली बार जनजातीय मंत्रालय बनाया।
  • मोदी सरकार ने जनजातीय बजट 28 हजार करोड़ से बढ़ाकर 1.5 लाख करोड़ किया।
  • द्रौपदी मुर्मु को राष्ट्रपति बनाना आदिवासी सम्मान का प्रतीक है।
  • देश से नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है।

झारखंड में विरोध ज्यादा क्यों?

झारखंड में आदिवासी पहचान केवल सामाजिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलन का केंद्र रही है। यहां:

  • सरना धर्म कोड की मांग,
  • जल-जंगल-जमीन आंदोलन,
  • CNT/SPT कानून,
  • पांचवीं अनुसूची,
  • पेसा कानून

जैसे मुद्दे लंबे समय से संवेदनशील रहे हैं। यही कारण है कि “वनवासी” शब्द को लेकर प्रतिक्रिया अधिक तेज दिखाई दी।

क्या यह केवल शब्दों का विवाद है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विवाद केवल भाषा का नहीं बल्कि इतिहास, संविधान, धर्म और राजनीति से जुड़ा है। मुख्य सवाल यह है कि:

  • आदिवासी पहचान क्या है?
  • क्या आदिवासी अलग धार्मिक-सांस्कृतिक समुदाय हैं?
  • क्या उन्हें “सनातन” ढांचे में शामिल माना जाए?
  • क्या “आदिवासी” शब्द राजनीतिक अधिकार देता है?
  • क्या “वनवासी” शब्द उस दावे को कमजोर करता है?

निष्कर्ष

अमित शाह के “वनवासी” संबोधन ने देश में आदिवासी पहचान की पुरानी बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है। एक ओर भाजपा और उससे जुड़े संगठन इसे सांस्कृतिक एकता और प्रकृति-पूजक परंपरा से जोड़कर देखते हैं, वहीं दूसरी ओर कई आदिवासी संगठन इसे उनकी स्वतंत्र पहचान को कमजोर करने की कोशिश मानते हैं।

झारखंड समेत कई राज्यों में यह मुद्दा आने वाले समय में और बड़ा राजनीतिक एवं सामाजिक विमर्श बन सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर आदिवासी अस्मिता, संवैधानिक अधिकार, धर्म और सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है।

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