चंद्रपुरा के विस्थापितों का रोजगार आंदोलन: विकास, अधिकार और न्याय की लड़ाई
प्चंद्रपुरा में रोजगार को लेकर उभरा जनआंदोलन
झारखंड के बोकारो जिले स्थित चंद्रपुरा क्षेत्र इन दिनों रोजगार और विस्थापन के मुद्दे को लेकर चर्चा में है। चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन (CTPS) के विस्तार और नई बिजली परियोजनाओं में स्थानीय एवं विस्थापित युवाओं को रोजगार देने की मांग को लेकर सैकड़ों महिला-पुरुषों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। आंदोलनकारी नेता लखी हेंब्रम के नेतृत्व में निकाली गई विशाल रैली में लोगों ने डीवीसी (Damodar Valley Corporation) प्रबंधन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया तथा स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर नौकरी देने की मांग उठाई।
यह आंदोलन केवल रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि विकास परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और पुनर्वास से भी जुड़ा हुआ है।
चंद्रपुरा डीवीसी पावर प्लांट का इतिहास
चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन (CTPS) झारखंड के सबसे महत्वपूर्ण विद्युत उत्पादन केंद्रों में से एक है। इसका संचालन दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) द्वारा किया जाता है, जिसकी स्थापना वर्ष 1948 में दामोदर घाटी क्षेत्र के विकास, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन के उद्देश्य से की गई थी।
चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन (CTPS) झारखंड के बोकारो जिले के चंद्रपुरा में स्थित है। यह भारत के सबसे पुराने और ऐतिहासिक ताप विद्युत संयंत्रों में से एक है, जिसका संचालन Damodar Valley Corporation (डीवीसी) द्वारा किया जाता है। यह परियोजना दामोदर घाटी क्षेत्र में औद्योगिक विकास, विद्युत उत्पादन और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ मानी जाती है।
चंद्रपुरा पावर प्लांट की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी।
- यूनिट-1 (130 मेगावाट) – अक्टूबर 1964
- यूनिट-2 (130 मेगावाट) – मई 1965
- यूनिट-3 (130 मेगावाट) – जुलाई 1968
उस समय यह एशिया के प्रमुख ताप विद्युत संयंत्रों में गिना जाता था। कई दशकों तक इस संयंत्र ने झारखंड, पश्चिम बंगाल और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों को बिजली उपलब्ध कराई।
बाद में डीवीसी ने आधुनिकीकरण के तहत दो नई इकाइयों का निर्माण किया:
- यूनिट-7 – 250 मेगावाट
- यूनिट-8 – 250 मेगावाट
वर्तमान में संयंत्र की संचालित क्षमता 500 मेगावाट है। इसके अतिरिक्त चंद्रपुरा में 2×800 मेगावाट की अत्याधुनिक सुपरक्रिटिकल ताप विद्युत परियोजना स्थापित करने की योजना पर कार्य चल रहा है, जिससे कुल 1600 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन होगा।
डीवीसी क्या है?
Damodar Valley Corporation की स्थापना वर्ष 1948 में दामोदर घाटी के समग्र विकास, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन के उद्देश्य से की गई थी। इसे भारत का पहला बहुउद्देशीय नदी घाटी निगम माना जाता है। चंद्रपुरा पावर प्लांट डीवीसी की प्रमुख ताप विद्युत परियोजनाओं में से एक है।
औद्योगिक विकास में योगदान
चंद्रपुरा प्लांट ने कई दशकों तक झारखंड और पश्चिम बंगाल के उद्योगों को बिजली उपलब्ध कराई।
विशेष रूप से:
- बोकारो स्टील प्लांट
- कोयला खदान क्षेत्र
- रेलवे नेटवर्क
- भारी उद्योग
को स्थिर बिजली आपूर्ति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
आधुनिकीकरण और नई इकाइयाँ
पुरानी इकाइयों के बूढ़े होने और पर्यावरणीय मानकों को देखते हुए डीवीसी ने विस्तार परियोजना शुरू की।
नई इकाइयाँ:
- यूनिट-7 : 250 मेगावाट (2011)
- यूनिट-8 : 250 मेगावाट (2011)
इन दोनों इकाइयों का निर्माण आधुनिक तकनीक के साथ किया गया। वर्तमान में चंद्रपुरा प्लांट की संचालित क्षमता 500 मेगावाट (2×250 MW) है।
पुरानी इकाइयों का बंद होना
पर्यावरणीय नियमों, तकनीकी सीमाओं और बढ़ती परिचालन लागत के कारण पुरानी इकाइयों को चरणबद्ध तरीके से बंद किया गया।
- यूनिट-1 बंद : 13 जनवरी 2017
- यूनिट-2 बंद : 30 जुलाई 2017
- अन्य पुरानी इकाइयाँ भी सेवानिवृत्त की गईं
इसके बाद प्लांट मुख्य रूप से नई 250-250 मेगावाट इकाइयों पर आधारित हो गया।
1600 मेगावाट की नई सुपरक्रिटिकल परियोजना
चंद्रपुरा अब एक और बड़े विस्तार के दौर से गुजर रहा है।
प्रस्तावित परियोजना:
- 2 × 800 मेगावाट
- कुल क्षमता : 1600 मेगावाट
- अनुमानित निवेश : लगभग ₹16,500 करोड़
- तकनीक : अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल
यह परियोजना डीवीसी और Coal India Limited के संयुक्त उपक्रम (JV) के रूप में विकसित की जा रही है।
रोजगार और विस्थापन का मुद्दा
वर्तमान में चंद्रपुरा क्षेत्र में सबसे बड़ा सामाजिक मुद्दा रोजगार और विस्थापन का है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि:
- परियोजना के लिए उनकी भूमि ली गई।
- रोजगार देने के आश्वासन दिए गए।
- विस्थापित परिवारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिले।
- नई 800-800 मेगावाट परियोजनाओं में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इसी मांग को लेकर लखी हेंब्रम के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है। स्थानीय लोगों का तर्क है कि विकास परियोजनाओं का लाभ सबसे पहले प्रभावित परिवारों को मिलना चाहिए।
विस्थापन और रोजगार का प्रश्न
चंद्रपुरा क्षेत्र के कई ग्रामीण और आदिवासी परिवारों का आरोप है कि बिजली परियोजनाओं के विस्तार के लिए उनकी भूमि अधिग्रहित की गई थी। लोगों का कहना है कि भूमि देने के समय रोजगार, पुनर्वास और विकास के कई आश्वासन दिए गए थे, लेकिन वर्षों बाद भी बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार रोजगार से वंचित हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब उनकी जमीन पर उद्योग और बिजली परियोजनाएं स्थापित की गई हैं, तो सबसे पहले स्थानीय और विस्थापित युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए।
लखी हेंब्रम के नेतृत्व में आंदोलन
इस आंदोलन का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी नेता लखी हेंब्रम कर रहे हैं।
डीवीसी प्रबंधन ने वर्षों से विस्थापित परिवारों की उपेक्षा की है। नई 800-800 मेगावाट इकाइयों में स्थानीय तथा विस्थापित युवाओं को रोजगार देना ही होगा, अन्यथा आंदोलन और तेज किया जाएगा।
आंदोलन में शामिल लोगों ने चेतावनी दी कि यदि रोजगार और पुनर्वास संबंधी मांगों पर गंभीर पहल नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।
आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें
- नई बिजली इकाइयों में स्थानीय एवं विस्थापित युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर नौकरी दी जाए।
- रोजगार नीति सार्वजनिक और पारदर्शी बनाई जाए।
- विस्थापित परिवारों से किए गए वादों को पूरा किया जाए।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
- पुनर्वास एवं आजीविका सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था की जाए।
- डीवीसी प्रबंधन और विस्थापितों के बीच नियमित संवाद स्थापित किया जाए।
संवैधानिक और कानूनी पहलू
विस्थापितों की मांगें निम्न संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ती हैं:
- अनुच्छेद 14 : समानता का अधिकार
- अनुच्छेद 21 : सम्मानजनक जीवन का अधिकार
- अनुच्छेद 38 : सामाजिक न्याय
- अनुच्छेद 39 : आजीविका के अवसर
साथ ही, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा पर बल देता है।
समस्या का मूल कारण
- रोजगार की कमी
- कौशल प्रशिक्षण का अभाव
- पुनर्वास योजनाओं का अधूरा क्रियान्वयन
- स्थानीय युवाओं की भर्ती में सीमित भागीदारी
- संवाद और विश्वास की कमी
समाधान क्या हो सकता है?
1. स्थानीय रोजगार नीति
डीवीसी और राज्य सरकार को स्थानीय एवं विस्थापित युवाओं के लिए विशेष रोजगार नीति लागू करनी चाहिए।
2. कौशल विकास केंद्र
तकनीकी प्रशिक्षण, आईटीआई, अप्रेंटिसशिप और रोजगार उन्मुख पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं।
3. पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया
सभी रिक्तियों को सार्वजनिक किया जाए तथा चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
4. पुनर्वास पैकेज की समीक्षा
विस्थापित परिवारों को आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वरोजगार सहायता उपलब्ध कराई जाए।
5. संयुक्त निगरानी समिति
डीवीसी, जिला प्रशासन और विस्थापित प्रतिनिधियों की संयुक्त समिति बनाकर समस्याओं का समाधान किया जाए।
6. CSR के माध्यम से विकास
शिक्षा, स्वास्थ्य, छात्रवृत्ति, महिला सशक्तिकरण और कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए।
क्षेत्र के लिए महत्व
चंद्रपुरा पावर प्लांट:
- झारखंड की बिजली आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है।
- हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार देता है।
- रेलवे, उद्योग और शहरी क्षेत्रों को ऊर्जा उपलब्ध कराता है।
- भविष्य की 1600 मेगावाट परियोजना के बाद इसकी भूमिका और बढ़ जाएगी।
निष्कर्ष
चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन केवल एक बिजलीघर नहीं बल्कि झारखंड के औद्योगिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। 1964 में शुरू हुई यह परियोजना आज 500 मेगावाट क्षमता के साथ संचालित हो रही है और आने वाले वर्षों में 1600 मेगावाट के बड़े विस्तार की ओर बढ़ रही है। हालांकि विकास के साथ-साथ विस्थापन, रोजगार और सामाजिक न्याय के प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। इसलिए सरकार, डीवीसी प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के बीच संतुलित संवाद तथा पारदर्शी रोजगार नीति ही इस क्षेत्र के सतत विकास का आधार बन सकती है।
चंद्रपुरा का वर्तमान आंदोलन केवल नौकरी की मांग नहीं बल्कि विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने की लड़ाई है। चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन ने पिछले छह दशकों में देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन विकास तभी पूर्ण माना जाएगा जब उससे प्रभावित परिवारों को भी सम्मानजनक जीवन, रोजगार और पुनर्वास का अधिकार मिले।
संविधान की भावना, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संवाद के आधार पर यदि डीवीसी प्रबंधन, सरकार और विस्थापित समुदाय मिलकर समाधान खोजते हैं, तो चंद्रपुरा विकास और जनकल्याण का एक आदर्श मॉडल बन सकता है।