जामताड़ा के शहरपुर में 16 एकड़ पुरातन पतित भूमि विवाद पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की कार्रवाई: डीसी को जारी हुआ नोटिस
प्रस्तावना
झारखंड के संताल परगना क्षेत्र में आदिवासी भूमि, सामुदायिक संसाधनों और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न एक बार फिर चर्चा में है। जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड अंतर्गत शहरपुर पंचायत में स्थित लगभग 16 एकड़ पुरातन पतित भूमि पर कथित अतिक्रमण और कब्जे के मामले को देश मांझी-पारगाना-बाईसी के नेतृत्व में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), नई दिल्ली तक पहुंचाया गया। इसके बाद आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जामताड़ा के उपायुक्त (डीसी) को नोटिस जारी किया है।
यह मामला केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि संताल परगना की ऐतिहासिक भूमि व्यवस्था, आदिवासी स्वशासन परंपरा और भूमि संरक्षण कानूनों से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त दस्तावेज के अनुसार राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, क्षेत्रीय कार्यालय रांची द्वारा 7 मई 2026 को जामताड़ा के उपायुक्त को पत्र जारी किया गया है।
पत्र में उल्लेख है कि:
- ग्राम शहरपुर, पंचायत शहरपुर, प्रखंड नारायणपुर, जिला जामताड़ा स्थित प्लॉट संख्या 363 एवं 364 (1932 खतियान) की भूमि से संबंधित शिकायत आयोग को प्राप्त हुई थी।
- शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी समुदाय की पुरातन पतित भूमि पर अवैध रूप से कब्जा किया गया है।
- इस संबंध में आयोग ने जांच प्रारंभ की।
- आयोग की माननीय सदस्य डॉ. आशा लकड़ा द्वारा 1 जून 2026 को दुमका परिसदन में सुनवाई निर्धारित की गई।
- जामताड़ा डीसी को संबंधित अभिलेखों एवं तथ्यों के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भूमिका
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत गठित एक संवैधानिक संस्था है।
आयोग के प्रमुख कार्य हैं:
- अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की रक्षा करना।
- भूमि, वन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय से जुड़े मामलों की जांच करना।
- राज्य सरकारों एवं प्रशासन को आवश्यक निर्देश देना।
- आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर हस्तक्षेप करना।
जब आयोग किसी मामले में नोटिस जारी करता है, तो संबंधित जिला प्रशासन को तथ्यों एवं अभिलेखों के साथ जवाब देना अनिवार्य होता है।
संताल परगना में भूमि संरक्षण का ऐतिहासिक महत्व
संताल परगना क्षेत्र का इतिहास भूमि संघर्षों से जुड़ा रहा है।
संताल हूल 1855
30 जून 1855 को वीर सिदो-कान्हु, चांद-भैरव और फूलो-झानो मुर्मू के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन और जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ संताल हूल (विद्रोह) हुआ था।
इस आंदोलन के प्रमुख कारण थे:
- आदिवासी भूमि पर बाहरी कब्जा
- महाजनी शोषण
- जमींदारों द्वारा उत्पीड़न
- पारंपरिक अधिकारों का हनन
हजारों संताल योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिसके बाद ब्रिटिश शासन को विशेष भूमि संरक्षण व्यवस्था लागू करनी पड़ी।
संताल परगना काश्तकारी व्यवस्था और भूमि कानून
संताल परगना में भूमि की सुरक्षा के लिए कई विशेष कानूनी प्रावधान बनाए गए।
इनका उद्देश्य था:
- आदिवासी भूमि की खरीद-बिक्री पर नियंत्रण।
- गैर-आदिवासियों द्वारा अवैध कब्जे को रोकना।
- सामुदायिक भूमि का संरक्षण।
- पारंपरिक ग्राम व्यवस्था को मान्यता देना।
संताल परगना टेनेंसी (SPT) व्यवस्था के तहत भूमि हस्तांतरण पर विशेष प्रतिबंध लागू हैं।
कौन-कौन सी सामुदायिक भूमि महत्वपूर्ण मानी जाती है?
संताल समाज में केवल खेती योग्य भूमि ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि सामुदायिक एवं धार्मिक महत्व की कई प्रकार की जमीनें भी संरक्षित मानी जाती हैं।
इनमें शामिल हैं:
1. जाहेर थान
संताल समुदाय का प्रमुख धार्मिक स्थल।
2. मांझी थान
ग्राम प्रशासन एवं पारंपरिक नेतृत्व का स्थान।
3. गोड बोंगा थान
पारंपरिक पूजा स्थल।
4. आबगे बोंगा थान
स्थानीय देवताओं की आराधना का स्थान।
5. दिहरी बोंगा थान
ग्राम देवताओं से संबंधित धार्मिक स्थल।
6. गोचर भूमि
पशुओं के चरने की सामुदायिक जमीन।
7. पतित भूमि
ऐसी भूमि जो तत्काल खेती में उपयोग नहीं हो रही हो लेकिन सामुदायिक संपत्ति का हिस्सा हो।
8. जंगल, पहाड़ और जल स्रोत
संताल संस्कृति में "जुमी-जागा, बिर-बुरू, नाई-गाड़ा" अर्थात भूमि, वन, पहाड़ और जल स्रोत सामुदायिक धरोहर माने जाते हैं।
देश मांझी-पारगाना-बाईसी की भूमिका
संताल समाज की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था में:
- मांझी – गांव प्रमुख
- पारगाना – कई गांवों का पारंपरिक प्रमुख
- देश मांझी – बड़े क्षेत्रीय नेतृत्व का प्रतिनिधि
- बाईसी – सामुदायिक निर्णय लेने वाली पारंपरिक संस्था
इन संस्थाओं का उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था, भूमि संरक्षण और सामुदायिक अधिकारों की रक्षा करना है।
इसी पारंपरिक व्यवस्था के प्रतिनिधियों द्वारा यह मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक पहुंचाया गया।
आयोग द्वारा नोटिस जारी होने का महत्व
डीसी को नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि आयोग ने किसी पक्ष को दोषी ठहरा दिया है।
बल्कि इसका मतलब है:
- शिकायत प्रथम दृष्टया जांच योग्य पाई गई।
- प्रशासन से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी गई।
- संबंधित पक्षों की सुनवाई होगी।
- भूमि अभिलेखों की जांच की जाएगी।
- कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के बाद आयोग अपनी अनुशंसा देगा।
इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और सुनवाई पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
संताल समाज के लिए संदेश
यह मामला संताल परगना के लोगों के लिए भूमि संरक्षण कानूनों की जानकारी रखने की आवश्यकता को भी दर्शाता है।
सिदो-कान्हु, चांद-भैरव, फूलो-झानो, शाम टुडू पारगाना, हाड़मा देशमांझी, गरभू मांझी, वीर बाजाल सोरेन तथा अन्य अनेक संताल योद्धाओं ने भूमि, जल, जंगल और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया था।
आज भी आदिवासी समाज के लिए यह आवश्यक है कि:
- भूमि संबंधी कानूनों की जानकारी रखें।
- खतियान एवं भूमि अभिलेख सुरक्षित रखें।
- सामुदायिक भूमि की निगरानी करें।
- कानूनी एवं संवैधानिक माध्यमों का उपयोग करें।
- पारंपरिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण करें।
निष्कर्ष
जामताड़ा के शहरपुर में 16 एकड़ पुरातन पतित भूमि से जुड़ा विवाद अब राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुका है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा जामताड़ा डीसी को नोटिस जारी किया जाना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है। हालांकि अंतिम निर्णय जांच और सुनवाई के बाद ही होगा, लेकिन यह घटना आदिवासी भूमि अधिकारों, संताल परगना के विशेष भूमि कानूनों तथा सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा के महत्व को पुनः उजागर करती है।
संताल हूल 1855 के शहीदों की विरासत केवल इतिहास नहीं, बल्कि भूमि, जल, जंगल और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का एक सतत संदेश है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है।