झटीपहाड़ी श्रीनाथ गाजन मेला 2026: आस्था, आदिवासी संस्कृति और नशामुक्त समाज का संदेश
पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के छातना प्रखंड स्थित झटीपहाड़ी में आयोजित होने वाला श्रीनाथ गाजन मेला इस वर्ष एक नई पहचान के साथ सामने आ रहा है। धार्मिक आस्था, आदिवासी संस्कृति, लोककला और ग्रामीण जीवन की रंगीन झलक प्रस्तुत करने वाला यह मेला अब नशामुक्त समाज के संदेश का भी वाहक बन गया है।
स्थानीय लोगों के बीच यह मेला "हुजुग गाजन" के नाम से प्रसिद्ध है, लेकिन इसका वास्तविक नाम श्रीनाथ गाजन मेला है। यहां भगवान शिव की पूजा श्रीनाथ रूप में की जाती है। हर वर्ष ज्येष्ठ महीने में आयोजित होने वाला यह मेला बांकुड़ा जिले के सबसे लोकप्रिय ग्रामीण सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है।
26 से 29 ज्येष्ठ तक चलता है मेला
झटीपहाड़ी चकबाजार से मोड़ की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित श्रीनाथ मंदिर इस आयोजन का धार्मिक केंद्र है। मंदिर के सामने जगन्नाथ मंदिर भी स्थित है। श्रद्धालु यहां भगवान श्रीनाथ शिव की पूजा-अर्चना करते हैं।
हालांकि धार्मिक अनुष्ठान मंदिर परिसर में होते हैं, लेकिन विशाल मेला झटीपहाड़ी चकबाजार रेलवे मैदान में आयोजित किया जाता है। यह मेला प्रतिवर्ष 26 ज्येष्ठ से 29 ज्येष्ठ तक चलता है और इसमें हजारों श्रद्धालु एवं पर्यटक भाग लेते हैं।
गाजन की परंपरा और धार्मिक महत्व
गाजन पश्चिम बंगाल की प्राचीन शैव परंपरा का महत्वपूर्ण लोक उत्सव है। श्रीनाथ गाजन के दौरान भक्त व्रत रखते हैं, विशेष पूजा करते हैं और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। ढाक की गूंज, भक्ति गीत और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा क्षेत्र उत्सवमय हो उठता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
आदिवासी संस्कृति का बड़ा मंच
झटीपहाड़ी मेला आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी महत्वपूर्ण मंच है। संथाल, भूमिज और अन्य आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में इस मेले में भाग लेते हैं।
पारंपरिक वेशभूषा, मांदर की थाप, लोकगीत और सामुदायिक नृत्य मेले की विशेष पहचान हैं। मेले में आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।
रातभर चलता है संथाली नाटक
मेले का सबसे बड़ा आकर्षण रात्रिकालीन संथाली ड्रामा (Santali Drama) होता है। मेले की रातों में स्थानीय और क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा संथाली भाषा में नाटकों का मंचन किया जाता है।
इन नाटकों में आदिवासी समाज की परंपराएं, सामाजिक मुद्दे, प्रेम कथाएं, ऐतिहासिक घटनाएं और लोककथाएं प्रस्तुत की जाती हैं। आसपास के गांवों से हजारों दर्शक रातभर इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेने पहुंचते हैं।
कई लोगों के लिए संथाली नाटक ही मेले का सबसे प्रतीक्षित कार्यक्रम होता है।
ग्रामीण बाजार और कुटीर उद्योग की रौनक
झटीपहाड़ी मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कुटीर उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण मंच है। बांकुड़ा, पुरुलिया और आसपास के क्षेत्रों के कारीगर और व्यापारी यहां अपनी दुकानें लगाते हैं।
मेले में उपलब्ध प्रमुख वस्तुएं:
- मौसमी फल
- मिठाइयां और पारंपरिक व्यंजन
- खिलौने
- घरेलू सामान
- कृषि उपकरण
- हस्तशिल्प सामग्रीबांस और लकड़ी से बने उत्पाद
- बांस और लकड़ी से बने उत्पाद
- कपड़े एवं सजावटी सामान
ग्रामीण हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग से जुड़े लोगों के लिए यह मेला आय का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
स्थानीय खान-पान की विशेष पहचान
झटीपहाड़ी मेले में ग्रामीण और आदिवासी खान-पान की विशेष झलक देखने को मिलती है। यहां फल, मिठाई, स्थानीय भोजन और पारंपरिक व्यंजन बड़ी मात्रा में बिकते हैं।
इसके अलावा कई दुकानों पर सुअर का मांस (पोर्क) भी उपलब्ध रहता है, जो क्षेत्र के कई आदिवासी समुदायों के पारंपरिक भोजन का हिस्सा है। इस कारण यह मेला स्थानीय खाद्य संस्कृति को समझने का भी महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
नशामुक्त झटीपहाड़ी मेले की पहल
इस वर्ष मेले की सबसे बड़ी विशेषता इसे नशामुक्त मेला बनाने का प्रयास है।
26–27 ज्येष्ठ 1433 बंगाब्द (10–11 जून 2026) के अवसर पर आयोजकों और सामाजिक संगठनों ने समाज की परंपरा, संस्कृति और स्वस्थ वातावरण की रक्षा के लिए नशामुक्त मेले का आह्वान किया है।
हालांकि पूर्व वर्षों में मेले के दौरान शराब, गांजा और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन इस बार स्थानीय समाज और प्रशासन ने इस पर सख्त रुख अपनाया है।
भारत ज़कात मांझी परगना महल का अभियान
आदिवासी संगठन भारत ज़कात मांझी परगना महल ने मेले को नशामुक्त बनाने के लिए व्यापक अभियान चलाया है।
संगठन का कहना है कि नशे के कारण समाज में पारिवारिक कलह, आर्थिक संकट और सामाजिक समस्याएं बढ़ रही हैं। इसी कारण संगठन ने छातना के प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO), आबकारी विभाग, पुलिस प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों को ज्ञापन सौंपकर मेले में किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ की बिक्री रोकने की मांग की।
इसके बाद प्रशासन, मेला समिति, आदिवासी संगठनों और जनप्रतिनिधियों की बैठक आयोजित की गई, जिसमें मेले को नशामुक्त बनाने पर सहमति बनी।
संगठन के पदाधिकारियों बाबूनाथ टुडू और अश्विनी कुमार हांसदा के अनुसार बांकुड़ा सदर, जामटोर, चिनाबाड़ी, धवन, सुसुनिया, तेघरी और झुंजका सहित कई गांवों में बैनर, पोस्टर और हैंडबिल के माध्यम से जनजागरूकता अभियान चलाया गया है।
समाज को नया संदेश
इस पहल का उद्देश्य केवल शराब या अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री रोकना नहीं, बल्कि युवाओं को नशे से दूर रखते हुए सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करना है।
आयोजकों का मानना है कि श्रीनाथ गाजन जैसा सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव तभी अपनी वास्तविक गरिमा बनाए रख सकता है जब वह स्वस्थ, सुरक्षित और नशामुक्त वातावरण में आयोजित हो।
आसपास के पर्यटन स्थल
झटीपहाड़ी आने वाले पर्यटक आसपास के कई दर्शनीय स्थलों का भी भ्रमण कर सकते हैं:
- सुसुनिया पहाड़
- हंसपहाड़ी डैम
- कालीपहाड़ी डैम
- बांकुड़ा के अन्य प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थल
ये स्थान क्षेत्र की पर्यटन संभावनाओं को और अधिक आकर्षक बनाते हैं।
परंपरा और परिवर्तन का संगम
झटीपहाड़ी श्रीनाथ गाजन मेला आज केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, आदिवासी पहचान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक जागरूकता का संगम बन चुका है। श्रीनाथ शिव की आराधना, संथाली नाटक, आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण बाजार और नशामुक्त समाज का संदेश इसे पश्चिम बंगाल के सबसे विशिष्ट ग्रामीण मेलों में शामिल करता है।
हर वर्ष हजारों लोगों की भागीदारी यह साबित करती है कि आधुनिकता के दौर में भी ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक हैं। वर्ष 2026 का नशामुक्त झटीपहाड़ी मेला इसी विरासत को नई दिशा देने का प्रयास माना जा रहा है।
मेले में उमड़ती है हजारों लोगों की भीड़
झटीपहाड़ी श्रीनाथ गाजन मेला केवल छातना या बांकुड़ा तक सीमित नहीं है। मेले में पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों के अलावा झारखंड के पुरुलिया, धनबाद, बोकारो और आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। कई परिवार हर वर्ष इस मेले में शामिल होने की परंपरा निभाते हैं।
मेले के दौरान रेलवे मैदान और आसपास का पूरा क्षेत्र लोगों से खचाखच भर जाता है। बच्चों के लिए झूले, युवाओं के लिए मनोरंजन के साधन और परिवारों के लिए खरीदारी की व्यवस्था इसे एक संपूर्ण ग्रामीण उत्सव का स्वरूप प्रदान करती है।
लोक संगीत और मांदर की थाप से गूंजता है इलाका
मेले के दौरान दिन से लेकर देर रात तक लोक संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन सुनाई देती है। मांदर, ढोल, धामसा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर आदिवासी युवक-युवतियां सामूहिक नृत्य प्रस्तुत करते हैं।
संथाली, बंगाली और स्थानीय लोकगीतों की प्रस्तुतियां मेले को सांस्कृतिक रूप से और अधिक समृद्ध बनाती हैं। यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का भी कार्य करता है।
गांवों की अर्थव्यवस्था को मिलता है सहारा
ग्रामीण मेलों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं। झटीपहाड़ी मेले में छोटे दुकानदार, हस्तशिल्पी, किसान और स्थानीय उद्यमी अपने उत्पाद बेचकर अच्छी आय अर्जित करते हैं।
कई परिवार पूरे वर्ष इस मेले का इंतजार करते हैं क्योंकि उनके लिए यह अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण अवसर होता है। विशेष रूप से कुटीर उद्योग और हस्तनिर्मित वस्तुओं से जुड़े लोगों को इस मेले से काफी लाभ मिलता है।
युवाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास
मेला समिति और सामाजिक संगठनों का प्रयास है कि युवा पीढ़ी केवल दर्शक बनकर न रहे, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सामाजिक अभियानों और पारंपरिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करे।
इसी उद्देश्य से नशामुक्ति अभियान को भी मेले से जोड़ा गया है। आयोजकों का मानना है कि यदि युवा वर्ग संस्कृति और खेलकूद से जुड़ा रहेगा तो समाज में नशे की प्रवृत्ति स्वतः कम होगी।
झटीपहाड़ी मेले की पहचान
आज झटीपहाड़ी श्रीनाथ गाजन मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण बंगाल की जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। यहां शिव भक्ति, आदिवासी परंपरा, लोककला, संथाली नाटक, ग्रामीण बाजार और सामाजिक जागरूकता एक साथ देखने को मिलती है।
वर्ष 2026 में आयोजित होने वाला नशामुक्त झटीपहाड़ी मेला इस संदेश को और मजबूत करता है कि समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए सकारात्मक बदलाव की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
झटीपहाड़ी का श्रीनाथ गाजन मेला परंपरा और परिवर्तन का अद्भुत संगम है। एक ओर यहां सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत जीवित है, तो दूसरी ओर नशामुक्त समाज और सामाजिक जागरूकता जैसे आधुनिक संदेश भी सामने आ रहे हैं। यही विशेषता इस मेले को बांकुड़ा ही नहीं, बल्कि पूरे राढ़ बंगाल के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल करती है।