धरती आबा के गुमनाम सेनानी: इतिहास के पन्नों से गायब उलगुलान के असली नायक
बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर विशेष
9 जून 1900 को अंग्रेजी हुकूमत की जेल में भगवान बिरसा मुंडा का निधन हुआ था। उनकी शहादत को 126 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन आज भी उनके साथ अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ लड़ने वाले अनेक वीर सेनानी इतिहास के अंधेरे कोनों में खोये हुए हैं। बिरसा मुंडा का नाम आज पूरे देश में सम्मान के साथ लिया जाता है, लेकिन उनके साथ जान की बाजी लगाने वाले दर्जनों आदिवासी योद्धाओं को न तो उचित पहचान मिली और न ही उनके बलिदान को इतिहास में वह स्थान मिल सका जिसके वे हकदार थे।
उलगुलान: अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासियों का महाविद्रोह
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी समाज पर अंग्रेजी शासन, जमींदारों और महाजनों का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही थीं और उनकी पारंपरिक व्यवस्था को नष्ट किया जा रहा था।
इसी अन्याय के खिलाफ बिरसा मुंडा ने "उलगुलान" यानी महान विद्रोह का बिगुल फूंका। देखते ही देखते हजारों मुंडा, उरांव और अन्य आदिवासी समुदायों के लोग उनके नेतृत्व में एकजुट हो गये।
सईल रकब (डोंबारी बुरू): आदिवासी बलिदान की धरती
खूंटी जिले के मुरहू प्रखंड में स्थित डोंबारी बुरू, जिसे सईल रकब भी कहा जाता है, झारखंड के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण स्थल है।
यहीं पर बिरसा मुंडा और उनके समर्थकों ने अंग्रेजी सेना का सामना किया था। अंग्रेजों की गोलियों से सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए थे। आज पहाड़ी के शिखर पर बना शहीद स्मारक उस संघर्ष की याद दिलाता है।
इस स्मारक के निर्माण में प्रसिद्ध शिक्षाविद और आदिवासी चिंतक रामदयाल मुंडा की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
40 से अधिक सेनानियों को मिली थी 'काला पानी' की सजा
बिरसा आंदोलन पर सबसे प्रामाणिक शोध करने वाले डॉ. कुमार सुरेश सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन" में उन 40 से अधिक मुंडा सेनानियों का उल्लेख किया है जिन्हें अंग्रेजों ने आजीवन निर्वासन यानी "काला पानी" की सजा सुनाई थी।
उस समय काला पानी का अर्थ था कैदियों को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भेजना।
इनमें शामिल प्रमुख नाम हैं—
- वीरसिंह मुंडा
- डोंका मुंडा
- मझिया मुंडा
- मकुर मुंडा
- गोनो मुंडा
- डरू मुंडा
- रतनु मुंडा
- सुरा मुंडा
- दुर्गा मुंडा
- रमई मुंडा
- भरतो मुंडा
- करमसिंह मुंडा
- सनिका मुंडा
- बुधू मुंडा
- टीपू मुंडा
- नामदेव मुंडा
- जयमासी मुंडा
- पारस मुंडा
और अन्य अनेक योद्धा।
इनमें से अधिकांश के नाम आज आम लोगों के लिए अपरिचित हैं।
क्या इतिहास से मिटा दिए गए आदिवासी सेनानियों के नाम?
लेखक एवं शोधकर्ता अश्विनी पंकज का मानना है कि जिन आदिवासियों को अंडमान भेजा गया था, उनके नाम सेल्युलर जेल के उपलब्ध अभिलेखों में नहीं मिलते।
उनका कहना है कि यह स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासियों के योगदान को हाशिये पर डालने का परिणाम है।
मुख्यधारा के इतिहास में लंबे समय तक आदिवासी आंदोलनों को वह महत्व नहीं दिया गया जो अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को मिला।
गोपी मुंडा के वंशज आज भी कर रहे सम्मान की मांग
जिउरी गांव के ग्राम प्रधान बिनसाय मुंडा, काला पानी की सजा पाने वाले गोपी मुंडा के वंशज हैं।
वे बताते हैं कि उनके दादा और पिता उन्हें परदादा के अंडमान निर्वासन की कहानियां सुनाया करते थे।
उन्होंने राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक को पत्र लिखकर अपने पूर्वजों के सम्मान की मांग की, लेकिन आज तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।
मझिया मुंडा और कुवर मुंडा कभी वापस नहीं लौटे
खूंटी के दुर्गम सेरेंगडीह गांव में आज भी लोग मझिया मुंडा और कुवर मुंडा की वीरता की कहानियां सुनाते हैं।
दोनों भाई बिरसा मुंडा के आह्वान पर आंदोलन में शामिल होने गये थे, लेकिन फिर कभी गांव वापस नहीं लौटे।
बाद में शोध पुस्तकों से पता चला कि मझिया मुंडा को काला पानी की सजा हुई थी।
गांव में उनकी स्मृति में पत्थलगड़ी स्थापित की गई है, जहां हर वर्ष श्रद्धांजलि दी जाती है।
अंडमान तक पहुंची उलगुलान की गूंज
अंडमान में रहने वाले सिलवेस्टर भेंगरा के अनुसार निर्वासित मुंडा सेनानियों को पहले रंगून (म्यांमार) ले जाया गया और उसके बाद अंडमान भेजा गया।
वे कहते हैं कि दुर्भाग्य से नई पीढ़ी अपने इतिहास से दूर होती जा रही है।
इसी कारण उन्होंने हर वर्ष बिरसा जयंती और शहादत दिवस मनाने का संकल्प लिया है ताकि इतिहास जीवित रहे।
गया मुंडा का परिवार भी भुगतता रहा अंग्रेजी दमन
बिरसा मुंडा के प्रमुख सहयोगी गया मुंडा के पुत्र जयमासी मुंडा को भी आजीवन निर्वासन की सजा सुनाई गई थी।
उनके परपोते रमय मुंडा बताते हैं कि पूरा परिवार अंग्रेजी शासन के दमन का शिकार हुआ।
घर की महिलाओं तक को जेल जाना पड़ा।
इसके बावजूद आज तक सरकार ने उनके पूर्वजों के योगदान को औपचारिक मान्यता नहीं दी।
बिरसा आंदोलन को कुचल दिया गया, लेकिन विचार नहीं
अंग्रेजी शासन ने उलगुलान को बलपूर्वक दबा दिया।
बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी हुई और 9 जून 1900 को जेल में उनकी मृत्यु हो गई।
लेकिन आंदोलन का प्रभाव इतना गहरा था कि अंग्रेजों को आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए बाद में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट 1908 जैसा महत्वपूर्ण कानून बनाना पड़ा।
आज भी यह कानून झारखंड की आदिवासी भूमि की रक्षा का प्रमुख आधार है।
साहित्य और शोध में अमर हुए धरती आबा
रामकृष्ण प्रसाद उन्मन ने 1962 में बिरसा मुंडा पर प्रसिद्ध काव्य रचना लिखी।
इसके बाद अनेक इतिहासकारों और साहित्यकारों ने उनके जीवन और आंदोलन को विस्तार से दर्ज किया।
प्रमुख कृतियां हैं—
- The Mundas and Their Country
- Encyclopaedia Mundarica
- Birsa Munda and His Movement
- अरण्येर अधिकार
- जंगल के दावेदार
विशेषज्ञों का मानना है कि महाश्वेता देवी के उपन्यासों और डॉ. कुमार सुरेश सिंह के शोध कार्यों ने बिरसा मुंडा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज की सबसे बड़ी जरूरत: गुमनाम नायकों को पहचान
बिरसा मुंडा आज राष्ट्रीय नायक हैं। संसद भवन से लेकर विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों तक उनके नाम का सम्मान है। लेकिन उनके साथ लड़ने वाले दर्जनों योद्धाओं के नाम अभी भी इतिहास की धूल में दबे हुए हैं।
इन सेनानियों के वंशज आज भी मांग कर रहे हैं कि—
- शहीदों के नाम पर स्मारक बनें।
- पत्थलगड़ी और स्मृति स्थल विकसित किये जाएं।
- पाठ्यपुस्तकों में उनका उल्लेख हो।
- अंडमान निर्वासित आदिवासियों का आधिकारिक रिकॉर्ड खोजा जाए।उनके परिवारों को सम्मान और पहचान मिले।
- उनके परिवारों को सम्मान और पहचान मिले।
निष्कर्ष
धरती आबा बिरसा मुंडा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और प्रतिरोध के प्रतीक हैं। लेकिन उनके आंदोलन की असली ताकत वे हजारों गुमनाम सेनानी थे जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज आवश्यकता है कि इतिहास के इन भूले-बिसरे नायकों को पहचान दी जाए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र का इतिहास तभी पूर्ण माना जाता है जब उसमें हर बलिदानी की कहानी दर्ज हो।
बिरसा मुंडा के साथ काला पानी की सजा पाने वाले और डोंबारी बुरू में शहीद हुए ये गुमनाम योद्धा झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक हैं।