मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधानसभा क्षेत्र बरहेट में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल, गंभीर हालत में युवती को नहीं मिली समय पर एम्बुलेंस
गरीब परिवार की बेटी को अस्पताल से रेफर किया गया, 108 सेवा से नहीं मिला जवाब
झारखंड के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन के विधानसभा क्षेत्र बरहेट से सामने आई एक घटना ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक गरीब परिवार की लगभग 18 वर्षीय युवती गंभीर अवस्था में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) बरहेट पहुंची, लेकिन समय पर उपचार और एम्बुलेंस सुविधा नहीं मिलने के कारण परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
जानकारी के अनुसार युवती की हालत अत्यंत नाजुक थी। प्राथमिक जांच के बाद उसे बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया गया। परिजनों ने मरीज को ले जाने के लिए कई बार 108 एम्बुलेंस सेवा पर संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सबसे हैरानी की बात यह रही कि अस्पताल परिसर के सामने एम्बुलेंस मौजूद होने के बावजूद जरूरतमंद मरीज को समय पर उपलब्ध नहीं कराई जा सकी।
मजबूरी में किराये की गाड़ी से ले जाना पड़ा मरीज को
परिजनों का आरोप है कि काफी देर तक इंतजार करने और व्यवस्था नहीं होने के कारण उन्हें निजी वाहन किराये पर लेकर युवती को दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह अतिरिक्त बोझ था, लेकिन बेटी की जान बचाने के लिए उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी गंभीर मरीज को मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में ही समय पर एम्बुलेंस नहीं मिल रही है, तो दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं के दावों पर उठे सवाल
झारखंड सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे करती रही है। 108 एम्बुलेंस सेवा का उद्देश्य गंभीर मरीजों को तत्काल चिकित्सा सहायता और सुरक्षित परिवहन उपलब्ध कराना है। आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में समय पर एम्बुलेंस उपलब्ध होना जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है।
लेकिन बरहेट की यह घटना बताती है कि जमीनी स्तर पर कई जगहों पर व्यवस्थाएं अपेक्षित रूप से काम नहीं कर रही हैं। देश के विभिन्न राज्यों में भी समय पर एम्बुलेंस न मिलने, तकनीकी खराबी या लापरवाही के कारण मरीजों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा है, जिनकी खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक चुनौती
झारखंड के कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल भवन बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, दवाइयां, रेफरल व्यवस्था और आपातकालीन परिवहन सेवाओं का सुचारू संचालन भी उतना ही जरूरी है।
बरहेट जैसे क्षेत्र, जहां बड़ी आबादी ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की है, वहां एम्बुलेंस सेवा की विफलता सीधे मरीजों के जीवन को खतरे में डाल सकती है।
जनता पूछ रही है जवाब
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं—
- अस्पताल के सामने मौजूद एम्बुलेंस मरीज को क्यों नहीं मिली?
- 108 सेवा पर संपर्क के बावजूद समय पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं हुई?
- गंभीर मरीज के रेफरल के बाद परिवहन की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
- जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
क्या हो समाधान?
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाने चाहिए—
- 108 एम्बुलेंस सेवा की नियमित मॉनिटरिंग और ऑडिट।
- सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में रेफरल मरीजों के लिए तत्काल परिवहन व्यवस्था।
- एम्बुलेंस संचालन में लापरवाही पाए जाने पर जवाबदेही तय करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त एम्बुलेंस की तैनाती।
- हेल्पलाइन कॉल रिस्पॉन्स सिस्टम को तकनीकी रूप से और मजबूत बनाना।
- मरीजों और परिजनों के लिए शिकायत निवारण की त्वरित व्यवस्था।
शिकायत कहां करें?
- जिला सिविल सर्जन (Civil Surgeon)
- जिला उपायुक्त (DC)
- राज्य स्वास्थ्य विभाग
- मुख्यमंत्री जनसंवाद केंद्र
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
- झारखंड राज्य मानवाधिकार आयोग
- उपभोक्ता आयोग (Consumer Commission)
- उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL)
सबसे पहले संबंधित जिले के सिविल सर्जन को लिखित शिकायत दें। घटना की तारीख, समय, अस्पताल का नाम, 108 कॉल रिकॉर्ड और गवाहों का विवरण शामिल करें।
जिला प्रशासन स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी करता है। DC को ज्ञापन देकर जांच की मांग की जा सकती है।
झारखंड स्वास्थ्य विभाग के सचिव और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) को शिकायत भेजी जा सकती है।
झारखंड सरकार के मुख्यमंत्री जनसंवाद पोर्टल या हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायत दर्ज की जा सकती है।
यदि स्वास्थ्य सेवा की लापरवाही के कारण जीवन का अधिकार प्रभावित हुआ हो, तो NHRC में शिकायत की जा सकती है।
राज्य स्तर पर भी मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायत दर्ज की जा सकती है।
यदि स्वास्थ्य सेवा प्रदाता की लापरवाही साबित होती है, तो पीड़ित परिवार मुआवजे की मांग कर सकता है।
यदि यह समस्या व्यापक स्तर पर हो रही हो तो सामाजिक संगठन या नागरिक PIL दायर कर सकते हैं।
यदि जान चली जाए तो जिम्मेदार कौन होगा?
यह जांच पर निर्भर करेगा कि लापरवाही किस स्तर पर हुई।
संभावित जिम्मेदार पक्ष
- 108 एम्बुलेंस सेवा संचालक
- कॉल रिसीव नहीं हुई।
- एम्बुलेंस उपलब्ध होने के बावजूद नहीं भेजी गई।
- अनावश्यक देरी की गई।
- अस्पताल प्रशासन
- रेफर करने के बाद मरीज के परिवहन की व्यवस्था नहीं की।
- एम्बुलेंस उपलब्ध होते हुए भी उपयोग नहीं कराया।
- आपातकालीन प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया।
- संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी
- यदि व्यवस्थागत लापरवाही या निगरानी में कमी पाई जाती है।
- राज्य सरकार/स्वास्थ्य विभाग
- यदि जांच में यह साबित हो कि सेवा व्यवस्था ही विफल थी और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
कानूनी रूप से क्या हो सकता है?
यदि यह साबित हो जाए कि:
- मरीज जीवित था,
- समय पर एम्बुलेंस या चिकित्सा सुविधा मिल सकती थी,
- लेकिन लापरवाही के कारण देरी हुई,
- और उसी देरी के कारण मृत्यु हुई,
तो संबंधित अधिकारियों या सेवा प्रदाताओं के खिलाफ विभागीय कार्रवाई, निलंबन, मुआवजा और कुछ मामलों में आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हो सकता है।
इस मामले में परिवार को क्या सबूत सुरक्षित रखने चाहिए?
- अस्पताल का रेफरल स्लिप
- 108 पर कॉल करने का स्क्रीनशॉट/कॉल डिटेल
- अस्पताल में मौजूद लोगों के बयान
- फोटो और वीडियो
- निजी वाहन का किराया रसीद (यदि उपलब्ध हो)
- मरीज के इलाज और मृत्यु (यदि हुई हो) से जुड़े दस्तावेज
इस मामले का सबसे बड़ा सवाल
यदि वास्तव में अस्पताल परिसर में एम्बुलेंस मौजूद थी, 108 सेवा को कॉल किया गया था और फिर भी गंभीर मरीज को समय पर सुविधा नहीं मिली, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि संभावित प्रशासनिक लापरवाही का मामला बन सकता है। इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देरी किस स्तर पर हुई और उसकी जिम्मेदारी किसकी है।
निष्कर्ष
बरहेट की यह घटना केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। करोड़ों रुपये की योजनाएं, सरकारी उपलब्धियां और स्वास्थ्य सुधार के दावे तब फीके पड़ जाते हैं जब किसी गरीब परिवार को आपातकाल में अपनी बेटी को बचाने के लिए किराये की गाड़ी का सहारा लेना पड़े। जनता को भाषण नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में भरोसेमंद और समय पर मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करता है या यह घटना भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ भुला दी जाएगी।