हूल दिवस पर बढ़ा विवाद: आदिवासी संगठनों ने डीजे, ऑर्केस्ट्रा और मनोरंजन कार्यक्रमों का किया विरोध
हूल कोई त्योहार नहीं, बल्कि आत्मबलिदान और संघर्ष का इतिहास है।
आगामी 30 जून को मनाए जाने वाले हूल दिवस को लेकर आदिवासी समाज में एक नई बहस शुरू हो गई है। एक ओर कई क्षेत्रों में हूल दिवस के अवसर पर डीजे, ऑर्केस्ट्रा, नृत्य-संगीत और मनोरंजन कार्यक्रमों की तैयारियां चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर कई प्रमुख आदिवासी सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने इसका खुलकर विरोध किया है।
हाल ही में भारत जाकात माझी परगना महल (BJMPM) बांकुड़ा जिला समिति तथा सांताड़ लाकचार सेमलेड़ ने अलग-अलग विज्ञप्तियां जारी कर स्पष्ट किया है कि हूल दिवस किसी प्रकार का उत्सव, मनोरंजन या मौज-मस्ती का अवसर नहीं है। यह दिन संताल समाज के हजारों शहीदों के बलिदान, संघर्ष और आत्मसम्मान की ऐतिहासिक विरासत को याद करने का दिन है।
1855 का हूल विद्रोह: आदिवासी अस्मिता की ऐतिहासिक लड़ाई
संगठनों ने अपने बयान में कहा है कि 30 जून 1855 को शहीद सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ हूल विद्रोह ब्रिटिश शासन, जमींदारी शोषण और महाजनी अत्याचार के खिलाफ एक ऐतिहासिक जनआंदोलन था। इस आंदोलन में हजारों संतालों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
संगठनों का मानना है कि जिन शहीदों के रक्त से यह इतिहास लिखा गया, उनके बलिदान को डीजे, चपरी ऑर्केस्ट्रा, नाच-गाने और अन्य मनोरंजन कार्यक्रमों के माध्यम से मनाना उनके संघर्ष और शहादत का अपमान है।
"हूल के इतिहास को बिगाड़ने की कोशिश बंद हो"
भारत जाकात माझी परगना महल, बांकुड़ा जिला समिति द्वारा जारी संदेश में कहा गया है कि हूल दिवस को उसकी वास्तविक भावना के साथ मनाया जाना चाहिए। समिति ने लोगों से अपील की है कि वे इस दिन को संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में याद करें तथा शहीदों के प्रति सम्मान प्रकट करें।
संगठन ने विशेष रूप से युवाओं से आह्वान किया है कि वे 30 जून को तमाक, तुमदाक और पारंपरिक संताली वाद्ययंत्रों के माध्यम से महान हूल विद्रोह के शहीदों को श्रद्धांजलि दें।
सांताड़ लाकचार सेमलेड़ की कड़ी चेतावनी
सांताड़ लाकचार सेमलेड़ की केंद्रीय समिति ने भी अपने बयान में कहा है कि हूल दिवस के नाम पर डीजे, ऑर्केस्ट्रा और मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित करना हूल के पवित्र इतिहास को विकृत करने जैसा है।
संगठन ने उन आयोजकों से अपील की है जिन्होंने पहले से ऐसे कार्यक्रमों के लिए अनुबंध कर लिया है कि वे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें और कार्यक्रमों को रद्द करें। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि हूल दिवस की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कार्यक्रम आयोजित किए गए तो संगठन प्रशासन के सहयोग से आवश्यक कदम उठाने पर मजबूर होगा।
समाज में शुरू हुई बहस
इस मुद्दे को लेकर आदिवासी समाज के भीतर भी अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। एक वर्ग का मानना है कि हूल दिवस केवल शहीदों की स्मृति, इतिहास चर्चा और जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रहना चाहिए। वहीं कुछ लोग मानते हैं कि सांस्कृतिक कार्यक्रम भी समाज की परंपरा और पहचान का हिस्सा हैं तथा उन्हें पूरी तरह नकारा नहीं जाना चाहिए।
हालांकि मतभेदों के बावजूद अधिकांश लोगों की राय है कि हूल विद्रोह का वास्तविक इतिहास और उसके बलिदान की भावना नई पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए।
30 जून पर टिकी निगाहें
अब सबकी नजरें 30 जून पर टिकी हैं कि हूल दिवस किस स्वरूप में मनाया जाएगा और आदिवासी संगठनों की इस अपील का कितना असर देखने को मिलेगा। एक बात स्पष्ट है कि हूल दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान, संघर्ष, अधिकारों की रक्षा और शहादत की अमर गाथा का प्रतीक है।
शहीद सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव और हूल विद्रोह के सभी वीर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि।
पदयात्रा में कौन-कौन से संगठन हैं शामिल?
इस आयोजन में कई सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- गोटा भारोत सिदो-कान्हू हूल बैसी, दुमका
- सोना संताल समाज, कदमा (साहेबगंज)
- जोहार मानव संसाधन विकास केन्द्र, दुमका
- प्रेम संस्था, काठीकुण्ड
- होलीफेथ, काठीकुण्ड
- अनुसूचित जाति एवं जनजाति रक्षा समिति, दुमका
निष्कर्ष
हूल दिवस केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि संताल समाज के संघर्ष, आत्मसम्मान और बलिदान की अमर गाथा है। यह दिन शहीद सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव और हजारों वीर संतालों के त्याग को स्मरण करने का अवसर है। डीजे, ऑर्केस्ट्रा और मनोरंजन कार्यक्रमों को लेकर भले ही समाज में अलग-अलग राय हो, लेकिन सभी का उद्देश्य हूल विद्रोह की विरासत और उसके संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। ऐसे में आवश्यक है कि हूल दिवस को उसकी मूल भावना, इतिहास और शहीदों के सम्मान के अनुरूप गरिमापूर्ण ढंग से मनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान से प्रेरणा ले सकें।