पद्म सम्मान 2026: जनजातीय समाज की गौरवशाली उपलब्धियों को मिला राष्ट्रीय सम्मान
प्रस्तावना
भारत विविध संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का देश है। इस विविधता में जनजातीय समुदायों का विशेष स्थान है, जिन्होंने सदियों से अपनी सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान, लोककला, साहित्य और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित रखा है। देश के विकास और सांस्कृतिक समृद्धि में आदिवासी समाज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इन्हीं योगदानों को सम्मानित करने के लिए भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष पद्म पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।
वर्ष 2026 के पद्म सम्मान जनजातीय समाज के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इस वर्ष कला, साहित्य, शिक्षा, कृषि, चिकित्सा और लोकसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कई आदिवासी व्यक्तित्वों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू द्वारा प्रदान किए गए ये सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की पहचान हैं, बल्कि जनजातीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक भी हैं।
पद्म पुरस्कार क्या हैं?
पद्म पुरस्कार भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक हैं। इनकी स्थापना वर्ष 1954 में की गई थी। ये पुरस्कार तीन श्रेणियों में प्रदान किए जाते हैं:
- पद्म विभूषण:असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए।
- पद्म भूषण:उच्च कोटि की विशिष्ट सेवा के लिए।
- पद्मश्री:किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट और विशिष्ट योगदान के लिए।
ये पुरस्कार कला, साहित्य, शिक्षा, सामाजिक कार्य, विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, उद्योग, खेल और लोकसेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में दिए जाते हैं।
कला के क्षेत्र में पद्मश्री: श्रीमती पोखिला लेखेथेपी
कार्बी संगीत की स्वर सम्राज्ञी
असम की प्रसिद्ध लोकगायिका श्रीमती पोखिला लेखेथेपी को कला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे कार्बी समुदाय की सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक हस्तियों में गिनी जाती हैं।
उन्हें प्रेमपूर्वक "क्वीन ऑफ मेलोडी" कहा जाता है। पिछले पाँच दशकों से अधिक समय से उन्होंने कार्बी संगीत और लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने का कार्य किया है।
संगीत यात्रा
पोखिला लेखेथेपी ने ऐसे समय में संगीत साधना शुरू की थी जब जनजातीय भाषाओं और लोकगीतों को व्यापक पहचान नहीं मिलती थी। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से कार्बी समाज की संस्कृति, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक जीवन और पारंपरिक मूल्यों को अभिव्यक्ति दी।
300 से अधिक गीतों की रचना
उन्होंने 300 से अधिक गीतों की रचना की है। उनके गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि कार्बी समुदाय के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के दस्तावेज भी हैं।
सांस्कृतिक संरक्षण में योगदान
उनकी कला ने नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी असम के अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनके गीतों की विशेष पहचान है।
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री: श्री चरण हेम्ब्रम
संताली समाज में शिक्षा क्रांति के अग्रदूत
ओडिशा के प्रसिद्ध संताली लेखक और समाज सुधारक श्री चरण हेम्ब्रम को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उन्होंने अपना जीवन आदिवासी समाज के शैक्षिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
इटुन आसरा केंद्रों की स्थापना
श्री हेम्ब्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि 1,500 से अधिक "इटुन आसरा केंद्रों" की स्थापना है।
इन केंद्रों का उद्देश्य था:
- संताली भाषा का संरक्षण
- पारंपरिक ज्ञान का हस्तांतरण
- बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराना
- जनजातीय संस्कृति को सुरक्षित रखना
शिक्षा और संस्कृति का संगम
उन्होंने शिक्षा को केवल साक्षरता तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा। उनका मानना था कि अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़कर ही आदिवासी समाज वास्तविक विकास कर सकता है।
युवा पीढ़ी को दिशा
उनके प्रयासों से हजारों आदिवासी युवाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। कई युवा आज शिक्षक, अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता बनकर समाज की सेवा कर रहे हैं।
साहित्य के क्षेत्र में पद्मश्री: श्री राबिलाल टुडू
संताली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर
पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध संताली साहित्यकार श्री राबिलाल टुडू को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।
वे पिछले तीन दशकों से संताली साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
बहुआयामी साहित्यकार
राबिलाल टुडू ने अनेक विधाओं में लेखन किया है:
- कहानी
- नाटक
- निबंध
- सांस्कृतिक लेख
- सामाजिक विमर्श
संताली पहचान का संरक्षण
उनकी रचनाएँ संताली समाज की परंपराओं, संघर्षों, जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।
उन्होंने साहित्य को सामाजिक जागरूकता का माध्यम बनाया और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य किया।
भारतीय साहित्य को समृद्ध किया
उनकी रचनाओं ने न केवल संताली साहित्य बल्कि भारतीय साहित्य को भी समृद्ध किया है। आज उनके लेखन को देशभर के साहित्यिक मंचों पर सराहा जाता है।
कृषि क्षेत्र में पद्मश्री: डॉ. जोगेश देउरी
एरी रेशम उद्योग के विकास पुरुष
असम के प्रसिद्ध रेशम वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ डॉ. जोगेश देउरी को कृषि क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।
उन्होंने एरी रेशम उद्योग के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया है।
एरी सिल्क की विशेषता
एरी सिल्क भारत की महत्वपूर्ण पारंपरिक रेशम प्रजातियों में से एक है। इसे "अहिंसा सिल्क" भी कहा जाता है।
डॉ. देउरी ने इस क्षेत्र को आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन से जोड़ा।
बोडोलैंड सिल्क पार्क
उन्होंने एकीकृत बोडोलैंड सिल्क पार्कों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस पहल से:
- 1,600 से अधिक गांव जुड़े
- हजारों किसानों को रोजगार मिला
- महिला स्व-सहायता समूहों को बढ़ावा मिला
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई
महिला सशक्तिकरण
उनके प्रयासों से बड़ी संख्या में महिलाएं रेशम उत्पादन और विपणन गतिविधियों से जुड़ीं। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी और सामाजिक परिवर्तन को गति मिली।
चिकित्सा क्षेत्र में पद्मश्री: डॉ. पद्म गुरमेट
सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति के संरक्षक
लद्दाख के प्रसिद्ध चिकित्सक और शोधकर्ता डॉ. पद्म गुरमेट को चिकित्सा क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।
वे पारंपरिक तिब्बती चिकित्सा प्रणाली "सोवा-रिग्पा" के प्रमुख विशेषज्ञों में गिने जाते हैं।
सोवा-रिग्पा क्या है?
सोवा-रिग्पा हिमालयी क्षेत्र की एक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है जो प्राकृतिक औषधियों और समग्र स्वास्थ्य दृष्टिकोण पर आधारित है।
शोध और दस्तावेजीकरण
डॉ. गुरमेट ने:
- 7 महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं
- 1,500 से अधिक चिकित्सा ग्रंथों का संरक्षण किया
- 1,200 से अधिक औषधीय सूत्रों का दस्तावेजीकरण किया
ज्ञान का संरक्षण
उनका कार्य केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है। उन्होंने एक पूरी ज्ञान परंपरा को संरक्षित किया है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है।
लोकसेवा के क्षेत्र में पद्म विभूषण: दिशोम गुरु शिबू सोरेन
आदिवासी अधिकारों की आवाज
झारखंड के महान जननायक और पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान उनके दशकों लंबे सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की राष्ट्रीय मान्यता है।
प्रारंभिक जीवन
शिबू सोरेन का जन्म एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं और शोषण को करीब से देखा।
झारखंड आंदोलन
उन्होंने झारखंड राज्य आंदोलन का नेतृत्व किया और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।
उनकी प्रमुख मांगें थीं:
- भूमि अधिकारों की रक्षा
- जल, जंगल और जमीन पर अधिकार
- सामाजिक न्याय
- आदिवासी पहचान का संरक्षण
दिशोम गुरु की पहचान
जनता उन्हें प्रेमपूर्वक "दिशोम गुरु" कहती थी, जिसका अर्थ है "जनता का मार्गदर्शक"।
उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
पद्म विभूषण का महत्व
यह सम्मान केवल शिबू सोरेन को नहीं बल्कि पूरे झारखंड और आदिवासी आंदोलन को समर्पित माना जा रहा है।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से यह सम्मान उनकी पत्नी श्रीमती रूपी सोरेन ने प्राप्त किया।
कला क्षेत्र में पद्मश्री: श्री भिकल्या लडक्या धिंडा
तारपा परंपरा के अंतिम महान कलाकारों में से एक
महाराष्ट्र के वरिष्ठ लोक कलाकार श्री भिकल्या लडक्या धिंडा को कला क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।
वे वारली समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं के प्रमुख संरक्षकों में से एक हैं।
तारपा वाद्ययंत्र
तारपा एक पारंपरिक वारली लोक वाद्ययंत्र है जो विशेष अवसरों और त्योहारों में बजाया जाता है।
आज इस कला को जानने वाले कलाकार बहुत कम बचे हैं।
सात दशक की साधना
श्री धिंडा ने 70 वर्षों से अधिक समय तक इस परंपरा को जीवित रखा।
उन्होंने न केवल स्वयं इस कला का अभ्यास किया बल्कि नई पीढ़ी को भी इसका प्रशिक्षण दिया।
सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण
उनके योगदान से एक विलुप्त होती सांस्कृतिक परंपरा को नया जीवन मिला है।
जनजातीय समाज के लिए इन सम्मानों का महत्व
इन पद्म सम्मानों का महत्व केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है।
ये सम्मान दर्शाते हैं कि:
- जनजातीय संस्कृति भारत की अमूल्य धरोहर है।
- पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां आज भी प्रासंगिक हैं।
- स्थानीय भाषाओं और कलाओं का संरक्षण आवश्यक है।
- जनजातीय समाज राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की प्रेरणादायक भूमिका
भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू द्वारा इन सम्मानित व्यक्तित्वों को पद्म पुरस्कार प्रदान किया जाना विशेष रूप से प्रेरणादायक है।
यह दृश्य भारत के लोकतंत्र, सामाजिक समावेशन और समान अवसरों की भावना को मजबूत करता है।
उनकी उपस्थिति ने देशभर के आदिवासी युवाओं को यह संदेश दिया कि प्रतिभा और परिश्रम के बल पर कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर सकता है।
निष्कर्ष
पद्म सम्मान 2026 भारत की जनजातीय विरासत के गौरव का उत्सव है। श्रीमती पोखिला लेखेथेपी, श्री चरण हेम्ब्रम, श्री राबिलाल टुडू, डॉ. जोगेश देउरी, डॉ. पद्म गुरमेट, श्री भिकल्या लडक्या धिंडा और दिशोम गुरु शिबू सोरेन जैसे व्यक्तित्वों ने अपने समर्पण, संघर्ष और प्रतिभा से समाज को नई दिशा दी है।
इन महान विभूतियों की उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। इनके कार्य यह सिद्ध करते हैं कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक ज्ञान और जनजातीय समाज की जीवंत विरासत में निहित है। पद्म सम्मान 2026 इसी गौरवशाली विरासत को राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित करने का ऐतिहासिक अवसर बन गया है।