संताल हूल माँहाँ पर ज्ञान का महाकुंभ, 428 छात्र-छात्राओं ने क्विज प्रतियोगिता में लिया भाग

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संताल हूल माँहाँ पर ज्ञान का महाकुंभ: 428 छात्र-छात्राओं ने क्विज प्रतियोगिता में लिया भाग

शिक्षा, संस्कृति और जागरूकता का अनूठा संगम

संताल हूल माँहाँ के अवसर पर संताल परगना महाविद्यालय, दुमका परिसर में रविवार को संताल लाहान्ती बाईसी एवं सह छात्र समन्वय समिति, संताल परगना प्रमंडल, दुमका के संयुक्त तत्वावधान में भव्य क्विज प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में संताल परगना प्रमंडल के विभिन्न महाविद्यालयों से कुल 428 छात्र-छात्राओं ने भाग लेकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

प्रतियोगिता का उद्देश्य: शिक्षा के प्रति बढ़े रुचि और आत्मविश्वास

आयोजकों के अनुसार प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य आदिवासी एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति प्रेरित करना था। साथ ही विद्यार्थियों में ज्ञान, जागरूकता, तार्किक क्षमता और आत्मविश्वास का विकास करना भी इस आयोजन का प्रमुख लक्ष्य रहा।

विभिन्न महाविद्यालयों से उत्साहपूर्ण भागीदारी

प्रतियोगिता में संताल परगना क्षेत्र के कई महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। इनमें:

  • एस.पी. कॉलेज, दुमका – 142 प्रतिभागी
  • मॉडल कॉलेज, राजमहल (साहिबगंज) – 94 प्रतिभागी
  • गोड्डा कॉलेज – 78 प्रतिभागी
  • साहिबगंज कॉलेज – 53 प्रतिभागीके.के.एम. कॉलेज, पाकुड़ – 42 प्रतिभागीबी.एस.के. कॉलेज, बरहरवा – 19 प्रतिभागी
  • के.के.एम. कॉलेज, पाकुड़ – 42 प्रतिभागीबी.एस.के. कॉलेज, बरहरवा – 19 प्रतिभागी
  • बी.एस.के. कॉलेज, बरहरवा – 19 प्रतिभागी

शामिल रहे।

संताल हूल, आदिवासी संस्कृति और साहित्य से जुड़ने का अवसर

मॉडल कॉलेज राजमहल में भी संताल हूल, आदिवासी दिवस एवं संताली साहित्य दिवस विषयक क्विज परीक्षा आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता के माध्यम से विद्यार्थियों को संताल हूल के इतिहास, आदिवासी संस्कृति, संताली साहित्य और सामाजिक चेतना के बारे में जानकारी दी गई।

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. रणजीत कुमार सिंह ने कहा कि इस प्रकार की प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत और इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं।

युवाओं में शिक्षा की अलख जगा रही है संताल लाहान्ती बाईसी

संयोजक जोसेफ बास्की ने बताया कि संताल लाहान्ती बाईसी का उद्देश्य केवल प्रतियोगिता आयोजित करना नहीं, बल्कि युवाओं में शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना, उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करना तथा समाज में शैक्षणिक वातावरण को मजबूत बनाना है।

आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धियां

इस आयोजन की कई सकारात्मक उपलब्धियां सामने आईं—

  1. आदिवासी युवाओं में शैक्षणिक जागरूकता का विस्तार
  2. सैकड़ों विद्यार्थियों ने भाग लेकर यह संदेश दिया कि आदिवासी समाज में शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है।

  3. सांस्कृतिक पहचान को मिली मजबूती
  4. प्रतियोगिता के माध्यम से विद्यार्थियों को संताल हूल के इतिहास, आदिवासी संस्कृति और संताली साहित्य की जानकारी मिली, जिससे अपनी जड़ों से जुड़ाव मजबूत हुआ।

  5. प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मिला प्रोत्साहन
  6. क्विज प्रतियोगिता ने विद्यार्थियों को सामान्य ज्ञान, इतिहास और समसामयिक विषयों की तैयारी के लिए प्रेरित किया।

  7. क्षेत्रीय एकता और सहभागिता का उदाहरण
  8. दुमका, साहिबगंज, गोड्डा, पाकुड़ और बरहरवा सहित कई जिलों के विद्यार्थियों ने एक मंच पर आकर क्षेत्रीय एकता और सहयोग की मिसाल पेश की।

  9. शिक्षा को लेकर सकारात्मक माहौल का निर्माण
  10. इस आयोजन ने समाज में यह संदेश दिया कि शिक्षा ही युवाओं के भविष्य को बेहतर बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

आयोजन में कई लोगों का रहा महत्वपूर्ण योगदान

कार्यक्रम को सफल बनाने में बिमल कुमार टुडू, ठाकुर हांसदा, राम सोरेन, उपेंद्र मरांडी, एमानवेल हेंब्रम, संजय हांसदा, ईश्वर हेंब्रम, विजय सिंह हांसदा, जीतलाल हांसदा, दिनेश टुडू, राजेश मुर्मू, रूबीधन मुर्मू, सुशील सोरेन, जूलियस मरांडी, दास सोरेन, शोले हांसदा, कारण बास्की, संजू हांसदा, लुगुलुमांग सोरेन, प्रेमशिला सोरेन, राजीन हांसदा, सुहागिनी सोरेन, मार्टिना हांसदा सहित छात्रावास के सभी छात्रनायक, छात्रनायिकाओं एवं सदस्यगण की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

निष्कर्ष

संताल हूल माँहाँ के अवसर पर आयोजित यह भव्य क्विज प्रतियोगिता केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने की एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई। 428 छात्र-छात्राओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने यह दर्शाया कि आदिवासी समाज के युवा शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति गंभीर एवं जागरूक हैं। इस प्रकार के आयोजन न केवल विद्यार्थियों के ज्ञान और आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत, इतिहास और पहचान से भी जोड़ते हैं। भविष्य में ऐसे कार्यक्रम शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोलने के साथ-साथ समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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