171वाँ हूल दिवस पदयात्रा 2026: दुमका से भोगनाडीह तक 105 किमी यात्रा, सिदो-कान्हू के बलिदान को नमन

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171वाँ हूल दिवस पदयात्रा 2026 : सिदो-कान्हू, चाँद-भैरो के बलिदान को नमन, दुमका से भोगनाडीह तक निकलेगी 105 किलोमीटर की ऐतिहासिक यात्रा

"सिदो-कान्हू अमर रहे! चाँद-भैरो अमर रहे!! हूल जोहार!"

झारखंड की धरती पर 1855 में अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ उठी "संताल हूल" की क्रांति आज भी आदिवासी समाज के संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है। इसी ऐतिहासिक विरासत को याद करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से गोटा भारोत सिदो-कान्हू हूल बैसी, दुमका तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में 171वाँ हूल दिवस पदयात्रा का आयोजन किया जा रहा है।

यह पदयात्रा 27 जून 2026 से 30 जून 2026 तक चलेगी, जिसमें पदयात्री दुमका के सिदो-कान्हू चौक (पोखरा चौक) से शहीद ग्राम भोगनाडीह तक लगभग 105 किलोमीटर की यात्रा करेंगे।

क्या है हूल दिवस का महत्व?

30 जून 1855 को संताल परगना के वीर योद्धा सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरो मुर्मू ने अंग्रेजी शासन, महाजनी शोषण और जमींदारी अत्याचार के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह का बिगुल फूंका था।

इस आंदोलन को "संताल हूल" कहा जाता है, जिसका अर्थ है "क्रांति" या "विद्रोह"

हजारों संतालों और स्थानीय लोगों ने अपने पारंपरिक हथियारों के बल पर आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेजी सेना का सामना किया। यह संघर्ष केवल आदिवासी समाज का नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक और सबसे बड़े जनविद्रोहों में से एक था।

हूल का परिणाम : संताल परगना का गठन

इतिहासकारों के अनुसार संताल हूल ने ब्रिटिश शासन को झकझोर दिया था। इस विद्रोह के परिणामस्वरूप प्रशासन को विशेष व्यवस्था लागू करनी पड़ी और 22 दिसंबर 1855 को संताल परगना जिले का गठन किया गया।

इस क्षेत्र में विशेष कानूनी एवं प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई, जिसका उद्देश्य स्थानीय लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना की रक्षा करना था।

आज भी संताल परगना की पहचान और उसके विशेष अधिकारों की जड़ें इसी आंदोलन से जुड़ी हुई हैं।

पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य

इस पदयात्रा का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि समाज को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ना भी है।

वे विशेष रूप से निम्नलिखित सांस्कृतिक विधाओं से जुड़ी रही हैं—

मुख्य उद्देश्य हैं—

  1. हूल के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करना।
  2. नई पीढ़ी को संताल हूल के इतिहास से परिचित कराना।
  3. समाज में एकता, भाईचारा और सामाजिक चेतना को बढ़ावा देना।
  4. पूर्वजों के बलिदान और संघर्ष को स्मरण करना।
  5. संताल परगना की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करना।

इस वर्ष का विशेष विषय

आयोजकों ने बताया कि वर्ष 2026 की पदयात्रा के दौरान परिचर्चा का मुख्य विषय होगा—

"वर्तमान समाज में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता"

इस विषय पर विभिन्न स्थानों पर चर्चा आयोजित की जाएगी।

इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं बल्कि—

  • बौद्धिक विकास,
  • नैतिक मूल्यों,
  • सामाजिक चेतना,
  • व्यवहारिक ज्ञान तथा
  • समाज के सर्वांगीण विकास

का आधार है।

पदयात्रा में कौन-कौन से संगठन हैं शामिल?

इस आयोजन में कई सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, जिनमें प्रमुख हैं—

  • गोटा भारोत सिदो-कान्हू हूल बैसी, दुमका
  • सोना संताल समाज, कदमा (साहेबगंज)
  • जोहार मानव संसाधन विकास केन्द्र, दुमका
  • प्रेम संस्था, काठीकुण्ड
  • होलीफेथ, काठीकुण्ड
  • अनुसूचित जाति एवं जनजाति रक्षा समिति, दुमका

पदयात्रा कार्यक्रम : दिनवार विवरण

27 जून 2026 (शनिवार)

दुमका से शुरुआत

  • सुबह 8 बजे सिदो-कान्हू चौक (पोखरा चौक) में कार्यक्रम का शुभारंभ।
  • स्कूली बच्चों और स्थानीय कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम।
  • विशिष्ट अतिथियों द्वारा सिदो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण।
  • पदयात्रियों को रवाना किया जाएगा।

इसके बाद पदयात्री—

  • सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय
  • फूलो-झानो चौक
  • कुकुरतोपा
  • गुहियाजोरी चौक

होते हुए काठीकुण्ड पहुंचेंगे।

28 जून 2026 (रविवार)

काठीकुण्ड से अमड़ापाड़ा

यात्रा मार्ग—

  • काठीकुण्ड
  • गड़ियापानी
  • पैडरकोला
  • गुम्मा मोड़
  • अमड़ापाड़ा

इस दौरान विभिन्न स्थानों पर स्थानीय लोगों द्वारा स्वागत किया जाएगा तथा सामयिक विषयों पर चर्चा होगी।

29 जून 2026 (सोमवार)

अमड़ापाड़ा से भोगनाडीह

यात्रा मार्ग—

  • अमड़ापाड़ा
  • शाहरघाटी
  • लिटीपाड़ा
  • बांसजोड़ी
  • धरमपुर चौक
  • बरहेट बाजार
  • पंचकठिया
  • भोगनाडीह

पंचकठिया शहीद स्मारक पर हूल के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी।

30 जून 2026 (मंगलवार)

भोगनाडीह में हूल दिवस समारोह

भोगनाडीह पहुंचने के बाद—

  • शहीद स्मरण सभा
  • सामयिक विषयों पर चर्चासांस्कृतिक कार्यक्रमहूल के शहीदों को श्रद्धांजलि
  • सांस्कृतिक कार्यक्रमहूल के शहीदों को श्रद्धांजलि
  • हूल के शहीदों को श्रद्धांजलि

आयोजित की जाएगी।

इसके बाद सभी पदयात्री अपने-अपने गंतव्य के लिए रवाना होंगे।

क्यों महत्वपूर्ण है भोगनाडीह?

भोगनाडीह केवल एक गांव नहीं बल्कि संताल हूल की जन्मस्थली है।

यहीं से 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू और उनके भाइयों ने हजारों लोगों के सामने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का ऐलान किया था।

इसलिए हर वर्ष हूल दिवस पर हजारों लोग यहां पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

समाज के लिए संदेश

171वीं हूल दिवस पदयात्रा केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह इतिहास, संघर्ष, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का अभियान है।

यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि हमारे पूर्वजों ने अपनी भूमि, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके आदर्शों को आगे बढ़ाएं, शिक्षा को अपनाएं और समाज के विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं।

निष्कर्ष

सिदो-कान्हू, चाँद-भैरो, फूलो-झानो और हजारों हूल शहीदों की कुर्बानी भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है। 171वाँ हूल दिवस पदयात्रा न केवल उनके बलिदान को नमन करने का अवसर है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और संघर्षपूर्ण इतिहास से जोड़ने का भी माध्यम है।

27 जून से 30 जून 2026 तक दुमका से भोगनाडीह तक निकलने वाली यह 105 किलोमीटर की पदयात्रा हूल की गौरवगाथा को जन-जन तक पहुंचाने का ऐतिहासिक प्रयास होगी।

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