DNA टेस्ट को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी: प्राइवेसी के अधिकार और बच्चे के पिता जानने के अधिकार के बीच संतुलन

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सुप्रीम कोर्ट: बच्चे का ‘पिता जानने का अधिकार’ और पिता के ‘प्राइवेसी अधिकार’ के बीच संतुलन

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में एक बहुत पुराने और मुश्किल सवाल का जवाब देने की कोशिश की है: क्या ज्यादा जरूरी है – एक बच्चे का अपने असली पिता को जानने का अधिकार, या एक व्यक्ति का अपनी निजी जिंदगी को गोपनीय रखने का अधिकार?

यह फैसला पितृत्व (यानी बच्चे का असली पिता कौन है) से जुड़े एक विवाद में आया है। कोर्ट ने कहा कि कुछ परिस्थितियों में DNA टेस्ट कराना जरूरी हो जाता है। यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि यह दो मौलिक अधिकारों के बीच बीच का रास्ता (संतुलन) खोजता है।

आइए, इस पूरे मामले को आसान शब्दों में कदम-दर-कदम समझते हैं।

मूल विवाद: दो अधिकारों के बीच टकराव

ज़रा एक स्थिति की कल्पना करें: एक बच्चा दावा करता है कि एक विशेष व्यक्ति उसका असली पिता है। वह व्यक्ति (कथित पिता) इस बात से इनकार करता है। सच्चाई जानने के लिए बच्चा DNA टेस्ट की मांग करता है। लेकिन वह व्यक्ति मना कर देता है और कहता है, "मेरा शरीर, मेरी मेडिकल रिपोर्ट और मेरी निजी जिंदगी सिर्फ मेरी है। DNA टेस्ट कराने का आदेश मेरे निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन है।"

यहाँ कानूनी लड़ाई दो पक्षों के बीच होती है:

  1. बच्चे का अधिकार: अपने माता-पिता को जानना (पिता कौन है), जो उसकी पहचान, विरासत और मानसिक सेहत को प्रभावित करता है।
  2. व्यक्ति (कथित पिता) का अधिकार: निजता, सम्मान और शारीरिक स्वायत्तता (बिना सहमति के शरीर से खून या ऊतक का नमूना लेने पर रोक)।

पुराना कानूनी नियम (धारा 112 – भारतीय साक्ष्य अधिनियम)

DNA जैसे वैज्ञानिक परीक्षणों के अस्तित्व में आने से पहले कानून में एक सरल नियम था। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 (नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 116) के अनुसार, किसी विवाहित महिला से पैदा हुआ बच्चा उसके पति की "वैध (legitimate)" संतान माना जाता था।

इस धारणा को चुनौती देने का एकमात्र तरीका यह साबित करना था कि पति का उस महिला तक "पहुंच (non-access)" नहीं थी – यानी बच्चे के गर्भधारण के समय उनका आपस में कोई संबंध नहीं था। इसे साबित करना बहुत मुश्किल था।

यह पुराना कानून 1872 में बना था, उस समय DNA की तकनीक का कोई अस्तित्व ही नहीं था।

नया अधिकार: प्राइवेसी एक मौलिक अधिकार है (2017)

लंबे समय तक भारतीय अदालतें DNA टेस्ट के आदेश देने से बचती रहीं क्योंकि उनका मानना था कि पुराना कानून काफी है। लेकिन साल 2017 में जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक मामले में सब कुछ बदल गया।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि निजता का अधिकार (Right to Privacy) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार है।

इस फैसले के बाद अदालतें और सतर्क हो गईं। उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि किसी व्यक्ति को DNA टेस्ट के लिए मजबूर करना उसकी निजता और शारीरिक स्वतंत्रता में गंभीर हस्तक्षेप है। अदालतें नियमित रूप से या हल्के में DNA टेस्ट का आदेश नहीं दे सकतीं।

तो फिर, DNA टेस्ट का आदेश कब दिया जा सकता है?

यह सबसे बड़ा सवाल था। अगर निजता का अधिकार मौलिक है तो क्या इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को कभी भी DNA टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता? और अगर ऐसा है तो बच्चे के अधिकारों का क्या होगा?

हाल के फैसले में (जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने) इस सवाल का जवाब दिया। उन्होंने निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें पितृत्व तय करने के लिए DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने एक संतुलन परीक्षण (balancing test) बनाया। आइए देखते हैं यह संतुलन कैसे काम करता है:

पहलू / आधारपिता की प्राइवेसी की रक्षाबच्चे के अधिकार की रक्षा
सामान्य नियमDNA टेस्ट “नियमित आदेश” नहीं हो सकता। केवल माँग करने से टेस्ट नहीं होगा।यदि सशक्त परिस्थितिजन्य सबूत (जैसे पत्र, तस्वीरें, गवाही) हों तो टेस्ट का आदेश संभव।
पुरानी धारणा (धारा 112)विवाह के भीतर पैदा बच्चे को पति की संतान माना जाए – परिवारिक प्राइवेसी सुरक्षित।यदि बच्चा ‘गैर-पहुँच’ (non-access) का मजबूत सबूत दे, तो धारणा तोड़ी जा सकती है।
वैज्ञानिक साक्ष्य बनाम पुराना कानूनव्यक्ति को उसकी सहमति के बिना DNA देने को विवश न करें।जब विज्ञान (DNA टेस्ट) और पुरानी कानूनी धारणा में टकराव हो, तो विज्ञान को प्राथमिकता मिलेगी।

मिसाल: एन.डी. तिवारी मामला (2014)

इस नए फैसले को समझने के लिए 2014 के एक चर्चित मामले को देखना जरूरी है, जिसमें वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी शामिल थे।

एक युवक, रोहित शेखर ने दावा किया कि एन.डी. तिवारी उनके जैविक पिता (biological father) हैं। तिवारी जी ने इस दावे को जोरदार ढंग से नकारा और छह साल तक मुकदमा लड़ा। उनका तर्क था कि उन्हें DNA टेस्ट के लिए मजबूर करना उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

दिल्ली हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने DNA टेस्ट का आदेश दिया। टेस्ट के नतीजे ने साबित कर दिया कि एन.डी. तिवारी ही रोहित शेखर के जैविक पिता थे।

इस मामले में कोर्ट ने साफ कहा:

  1. बच्चे को DNA टेस्ट की मांग करने का पूर्ण अधिकार नहीं है।
  2. पिता को प्राइवेसी का पूर्ण अधिकार भी नहीं है।
  3. कोर्ट दोनों के बीच संतुलन बनाएगा:
    • बच्चे की सच्चाई जानने की जरूरत (जो उसकी पूरी जिंदगी पर असर डालती है)।
    • पिता की अपने निजी मामलों को छिपाए रखने की इच्छा।

यह मामला पितृत्व विवादों के लिए एक मार्गदर्शक बन गया।

निष्कर्ष

इस नए फैसले का क्या मतलब है?

सुप्रीम कोर्ट का यह नवीनतम फैसला किसी एक पक्ष की जीत नहीं है। बल्कि यह एक व्यावहारिक समझौता है। यहाँ मुख्य बातें याद रखें:

  1. प्राइवेसी महत्वपूर्ण है, लेकिन असीमित नहीं है:अगर किसी बच्चे के पास मजबूत सबूत हैं कि आप ही पिता हैं, तो आप निजता के अधिकार की दीवार के पीछे नहीं छिप सकते।
  2. DNA टेस्ट नियमित नहीं होंगे:अदालतें सिर्फ किसी को परेशान करने या जासूसी करने के लिए DNA टेस्ट की अनुमति नहीं देंगी। कोई गंभीर और वास्तविक विवाद होना चाहिए।
  3. बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है:कोर्ट मानता है कि एक बच्चे की पहचान और अपनी जड़ों को जानने का अधिकार उसके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति के लिए बुनियादी है।
  4. विज्ञान पुरानी मान्यताओं पर भारी है:पुराना कानून (धारा 112) अभी भी मान्य है, लेकिन इसका इस्तेमाल वैज्ञानिक सबूतों को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता। अगर DNA टेस्ट सच्चाई निकाल सकता है, और वह सच्चाई बच्चे के लिए महत्वपूर्ण है, तो अदालत इसकी इजाजत देगी।
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